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उत्तराखंड: इतिहास महाराजा अजय पाल

सौजन्य: श्रधेय स्वर्गीय भक्त दर्शन       लेखनी: मुजीब नैथानी (उ वि पा)

महाराजा अजयपाल

महाराजा अजय पाल ने गढ़वाल राज्य के संरक्षण व संवर्धन की ओर ध्यान दिया। यहां पर यह भी स्पष्ट कर दिया जाए कि पहले इस प्रदेश का नाम केदारखंड उत्तराखंड देव भूमि ब्रह्मदेश आदि था, लेकिन श्रीनगर राजधानी आ जाने के बाद तथा समस्त गढ़वाल के एक ही महाराज की छत्रछाया में संगठित हो जाने के कारण अब *गढ़वाल* के नाम से प्रसिद्ध हुआ । महाराज जानते थे कि पुराने गणपतियों के हृदय में अपनी स्वाधीनता की अग्नि शीघ्र नहीं बुझ सकती, इसलिए नीतिज्ञता पूर्व उन्हें स्वीकृति दे दी गई , कि वे श्रीनगर दरबार की संरक्षता में अपने-अपने घरों पर राज्य करते रहे । लेकिन धीरे-धीरे उन्हें मिलाने की कोशिश की गई । उनमें से कई प्रमुख सरदार यथा- असवाल ठाकुर और गोरला रावतों के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित किए गए । धीरे-धीरे उन्होंने उन गढ़पतियों की नियुक्ति अपने उच्च पदाधिकारियों की तरह करनी शुरू कर दी । परिणाम स्वरुप उनकी रही सही स्वाधीनता भी लुप्त हो गई और वह पूरी तरह श्रीनगर दरबार पर आश्रित हो गए ।
उन्होंने उन्हें अपना दरबारी बना कर सम्मानित किया और गढ़वाल राज्य के दोबारा विश्रृंखल होने की आशंका को सदा के लिए समाप्त कर दिया। इसके अतिरिक्त उन्होंने भी सारे प्रदेश का पुनर्गठन किया। इन्होंने पुराने गणपति के पास थोड़े थोड़े सैनिक रहने दिए ताकि उन्हें बुरा ना लगे और एक केंद्रीय फौज का निर्माण किया। क्योंकि श्रीनगर से ही विस्तृत सीमाओं की सुविधा पूर्वक रक्षा नहीं हो सकती थी इसलिए इन्होंने सीमावर्ती गढ़ों पर फौजी टुकड़ियों की नियुक्ति की । गुजड़ू गढ़, महाबगढ़ ,लंगुरगढ़ के अतिरिक्त पूर्व पश्चिम और उत्तर की सीमाओं पर भी चौकियां स्थापित की गई। जो सैनिक वहाँ रहते थे उन्हें वेतन के बदले यथेष्ट भूमि देने की व्यवस्था की गई उदाहरणस्वरूप पूर्व की दिशा में लोहाबगढ़ के प्रसिद्ध किले में जिन वीरों को नियुक्त किया गया था उन्हें वहां की सेवाओं के उपलक्ष में गोचर के पार्श्व में स्थित प्रसिद्ध पनाई के सेरे का सर्वोत्तम भाग दिया जाता था । इसलिए यह उक्ति चालू हो गई थी ” *जो ध्यो लोहाबगढ़ मुंडली* , *सो खौ पनाई की कुंडली*”। उन्हीं वीर सैनिकों के वंशज कनूणी व मूसनी जातियों के लोग अब तक पनाई में मौजूद है ।
संगठन के सिलसिले में ही उन्होंने एक और महत्वपूर्ण काम किया। उनकी सेना में सरोला गंगाडी ब्राह्मण तथा सभी जातियों के क्षत्रिय थे। खानपान के प्रश्न को लेकर उनमें आपसी मतभेद रहा करता था । इस बात को मिटाने के लिए उन्होंने आज्ञा प्रचारित की कि सरोला ब्राह्मणों का दिया हुआ भोजन सब लोग खा लें । आज्ञा के अनुसार उनकी सेना ही नहीं बल्कि सारे समाज नें अनुकरण किया और यह व्यवस्था अब तक भी चली आ रही है । राज्य के केन्द्रीयकरण तथा सुव्यवस्था के लिए इन्होंने परगनों तथा पट्टियों का विभाजन किया,तथा तोल व माप के परिमाणों का समानीकरण भी किया । आज भी गढ़वाल में एक सरकारी पाथा है और एक ड्यूलि पाथा कहलाता है । इस पाथे का प्रचार इन्होंने देवलगढ़ से किया था। इस प्रकार विभिन्न पाथों के स्थान पर एक ही पाथे का सारे राज्य में प्रचलन हो गया । इसी प्रकार के इन्होंने अन्य अनेक महत्वपूर्ण कार्य किए अजय पाल की स्थापना की लोकोक्ति अभी तक प्रचलित है

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