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बलभद्र “पाल” से “शाह” की उपाधि

सौजन्य :श्रद्धेय स्वo भक्तिदर्शन जी

कलम :मुजीब नैथानी                                                       (अध्य्क्ष उत्तराखंड विकाश पार्टी)

बलभद्र”पाल” से “शाह” की उपाधि:

महाराजा अजय पाल के वंशज महाराज सहजपाल के घर बलभद्र पाल का जन्म 1457 ईस्वी में हुआ। उन्होंने बचपन से ही अपनी वीरता का परिचय देना शुरु कर दिया था और शस्त्र चालन तथा आखेट में अद्भुत निपुणता प्राप्त कर ली थी । पर जब यह 17 वर्ष के थे कि महाराज सहजपाल का देहांत हो गया। और सन 1473 इसमें यह महाराज बलभद्र पाल के नाम से गद्दी पर बैठे ।
इनकी वीरता के विषय में एक गाथा इस प्रकार प्रचलित है कि श्रीनगर के राज महल के उस भाग में जहां रानियां रहती थी एक विशाल फाटक था । वह पत्थर का बना हुआ था और उसको तीस-चालीस व्यक्ति मिलकर खड़ा कर सकते थे । एक बार सन 1495 में वह कमजोर होकर तिरछा हो गया और गिरने ही वाला था कि इन की नजर उस पर पड़ी । उन्होंने फौरन कंधा लगाकर उसे खड़ा कर दिया और बाद को उसकी मरम्मत करा दी ।
इस प्रकार की घटनाओं के कारण एक *जनश्रुति के अनुसार लोग इन्हें भीमसेन का अवतार मानते थे।*
यह केवल बलशाली ही नहीं थे बल्कि एक चतुर राजनीतिज्ञ थे। यह जानते थे कि दिल्ली के सम्राट से मित्रता का संबंध कर लेने से राज्य की प्रतिष्ठा बढ़ेगी। इनसे पहले किसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया था । इन्होंने उसी उद्देश्य से *महाराजा अजय पाल के समय में स्थापित लंगूर गढ़ और महाबगढ़ आदि की फौजी चौकियों को मजबूत बनाया*। उन दिनों कई डाकू मैदानों में डाका डालते और फिर भागकर गढ़वाल के दक्षिणी पर्वतों में आ छुपते इस प्रकार शाही सिपाही उन्हें पकड़ नहीं पाते थे ।
इन्होंने अपनी फौजी चौकियों की सहायता से उन सब लुटेरों को पकड़ लिया और उन्हें दिल्ली दरबार भेज दिया। इस कारण दिल्ली और श्रीनगर के दरबारों में मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित हो गया तथा आपस में राजदूत भेजने की प्रथा कायम हो गई ।
संभवतया *इन्हीं के राजदूत होकर वे बर्थवाल ठाकुर दिल्ली गए थे और वहां अपनी योग्यता प्रदर्शित कर अपना व गढ़वाल का नाम ऊंचा किया था ।*
उसी बीच एक महत्वपूर्ण घटना हुई एक बार कोटद्वार भाबर की ओर बलभद्र पाल शेर का शिकार खेलने गए हुए थे। उन्हीं दिनों नजीबाबाद में शाही डेरा पड़ा हुआ था। और *बादशाह सुल्तान सिकंदर खान लोदी* (राज्य काल सन 1490 से 1517 तक) शिकार खेल रहे थे । सौभाग्य से जंगल में दोनों की मुलाकात हो गई । राजकीय संबंध तो पहले ही स्थापित हो चुका था, अब व्यक्तिगत मैत्री भी हो गई। दोनों ने कुछ दिन साथ ही शिकार खेला। उन्होंने बादशाह को शिकार में बहुत मदद दी और एक बार तो एक खूंखार शेर से उनकी प्राण रक्षा भी की। बादशाह उनकी बुद्धिमानी ,बल और पराक्रम पर इतने मुग्ध हो गए कि इन्हें निमंत्रण देकर अपने साथ दिल्ली ले गए। वहां इनका राजसी आदर-सत्कार हुआ और दोनों राज्यों में महत्वपूर्ण संधि हो जाने के बाद वह सम्मान के साथ गढ़वाल लौट आए। उन्हीं दिनों मुस्लिम साम्राज्य की उत्तरी सीमा पर संभवतया नाहन और जौनसार-बावर की ओर से कतिपय लुटेरों ने बड़ा उत्पात मचा रखा था। झुंड के झुंड पहाड़ों से उतरते और अंबाला तथा सहारनपुर के मैदानी गांव में लूटपाट मचाते ।जब शाही सेना उनका दमन करने भेजी जाती तो वे पहाड़ों में भाग जाते और वहां मैदानी फौजी उनका पीछा नहीं कर पाती थी । ऐसी परिस्थिति देखकर बादशाह ने इन्हें लिखा यदि संभव हो तो उन लोगों का दमन करने में सहायता कीजिए। उन्होंने उस अनुरोध को सहर्ष स्वीकार कर लिया और अपनी सेना लेकर वहां धावा बोल दिया । गढ़वाली सैनिक तो पहाड़ों के आदी थे ही उन्होंने कुछ समय के अंदर वहां शांति स्थापित कर दी। साथ ही पिछली लूटमार के बदले उनसे काफी बड़ा जुर्माना वसूल किया और भविष्य में स्थाई शांति रखने के लिए उनसे लिखित बचन भी ले लिया । जुर्माना व शर्तनामा एक मास के अंदर दिल्ली दरबार में पहुंचा दिया गया ।
उस वीरतापूर्ण विजय के लिए बादशाह ने इनके पास बहुमूल्य *खिलअत, सोने की तलवार और ” शाह “* की पदवी भेजी। इन्होंने धन्यवाद पूर्वक पदवी स्वीकार की और *बलभद्र “पाल” के स्थान पर अपना नाम बलभद्र “शाह”* रखने की घोषणा कर दी। तभी सन 1496 ईस्वी से यह पदवी गढ़वाल नरेशों के नाम के साथ चली आ रही है। महाराज बलभद्रशाह एक योग्य शासक थे। उन्होंने सारे राज्य की भूमि का बंदोबस्त कराया। टिहरी राज्य संग्रह में उनके समय का एक महत्वपूर्ण कागज सुरक्षित है । उसमें उसमें परगनावार ” ज्युलों” का विवरण दिया गया है। उस कागज से इन बातों पर प्रकाश पड़ता है ।(1) परगने की पूरी रकम में “नजर”।(2) किस ढंग से यह वसूल किया जाता है । -(अ) किन किस्तों में वह संग्रह होता है ।(ब) उन व्यक्तियों के नाम जिनके मार्फत एकत्रित किया जाता है ।(स) किन तारीखों पर वे किस्त जमा की जाती है।(3) खर्च कितना एकत्रित होता है और कैसे उसका बंटवारा किया जाता है। इसी एक विवरण से इनकी शासन पटुता का परिचय मिलता है।

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